यही मर जाएंगे पर वापस नहीं जाएंगे

यही मर जाएंगे पर वापस नहीं जाएंगे
22/01/2021, by , in Hindi

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सिंघु बॉर्डर से . पौ फटने पर हवा के हल्के झोंके खाली सड़कों पर पंखा झलते हैं. कहीं किसी पेड़ की परछाइयां नहीं है. मोटर और गाड़ियों का शोर सड़क के काफी पहले से थम गई हैं. धूल की परत  सूरज के सुनहरे आलोक में से छनकर सड़कों पर छा गई है ,जहां औरतों और मर्दों की भारी भीड़ है. धीमी आवाजें, कही तेज़ आवाज और असंख्य जूतों की पदचाप से ये पता लगाना आसान नहीं है कि सिंघु बॉर्डर पर कुल कितने किसान जमा हैं. महिलाओं और बच्चों का हुज़ूम. हर उम्र की औरतें. तख्तियां , पोस्टर, किताबें लिए ये औरतें जिन्दगी के लिए लड रही है. बड़े से शामियाने में हजारों की तादाद में औरतें जमा है.  मैं देख रही हूं उन औरतों को जो अपने घर बार छोड़कर सड़कों पर लड रही है. ये थका देने वाला समय है., ठंडी और तेज़ हवा से बचने के लिए पुआल डालकर जगह जगह तंबू बने हैं जो इन औरतों का घर बन गया है. मैं मिली हरजीत कौर से. चेहरे पर पड़ी झुर्रियां जैसे बीते समय का गवाह हो. अम्मा आप कितने साल की हैं? पता नहीं बिटिया . कमबख्त जिन्दगी की इतिहास में कोई जगह नहीं है. जिस साल देश आजाद हुआ मैं दस साल की थी. तुम जोड़ कर पता कर लो मैं कितने साल की हूं.  यहां क्यों आई हैं अम्मा? उनकी आंखें चमकती है. मेरा पोता आया यहां. हमने कहां मुझे भी ले चलो. अपने खेत को हमें भी बचाना है. मोदी सरकार को बेचने नहीं देंगे देश. अम्मा सुप्रीम कोर्ट कहती है कि इस आंदोलन से बच्चों और बुजुर्गो को अलग करना है – ये कौन हैं हमें नसीहत देने वाले. हम तो यहीं रहेंगे ,अगर किसान विरोधी बिल वापस नहीं हुआ तो यही मर जाएंगे बिटिया पर वापस नहीं  जाएंगे. मैं उनकी लरजती आवाज सुन रही थी और सोच रही थी कि आजादी का ये दूसरा आंदोलन है.  अम्मा की उम्र की कई औरतें इस कड़ाके की ठंड में अपने हक़ के लिए लड रही है. मैं हैरान हूं. यहीं तो हैं असली किसान महिलाएं. जिनके हाथों में देश की रोटी सुरक्षित है. शाम ढलने लगी, आसमान में तिरते उजाले अब खो गए हैं. पल पल बढ़ती हुई तेज़ बहशी हवा ने भी इस उम्र में संघर्ष कर रही औरतों को सलाम किया. कई जोड़े हाथ हवा में लहराए – मुट्ठियां तनी – लड़ेंगे – जीतेंगे. दूर ढोलक की थाप पर गाने को आवाज आ रही है….  मैं स्वर लहरियों में डूब रही हूं.

हुण मैं अनहद नाद बजाया,

तैं क्यों अपणा आप छुपाया,

 

नाल महिबूब सिर दी बाज़ी,

जिसने कुल तबक लौ साजी,

मन मेरे विच्च जोत बिराजी,

आपे ज़ाहिर हाल विखाया.

हुण मैं अनहद नाद बजाया.

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